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कमोडिटी बाजार : एग्री कमोडिटी : दलहन आयात, फ्युमिगेशन और खपत को लेकर क्या कहना है IPGA के CEO प्रदीप घोरपड़े का?

Updated Apr 18, 2017, 05.24 AM IST | Manoj Kumar

देश मे इस साल दलहन का रिकॉर्ड उत्पादन है लेकिन इसके बावजूद दालों के आयात अच्छा रहा है, 2017-18 में भी आयात कुछ कम जरूर रह सकता है लेकिन फिर भी 50 लाख टन के स्तर तक पहुंच सकता है यह कहना है इंडियन पल्सेज एंड ग्रेन एसोसिएशन के सीईओ प्रदीप घोरपड़े का, मार्केट टाइम्स को दी जानकारी में प्रदीप घोरपड़े ने कहा कि 2017-18 के दौरान देश में दलहन की खपत में इजाफा हो सकता है।

प्रदीप के मुताबिक मार्च में खत्म हुए वित्तवर्ष 2016-17 के दौरान देश में करीब 57 लाख टन दलहन का आयात हुआ है और 2017-18 के दौरान आयात 48-50 लाख टन के बीच रहने का अनुमान है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने सितंबर में खत्म होने वाले 2016-17 सीजन के दौरान देश में कुल 221 लाख टन दलहन पैदा होने का अनुमान लगाया है जो अबतक का सबसे अधिक उत्पादन होगा।

इस साल रिकॉर्ड पैदावार की वजह से देश में दलहन की कीमतों में भारी गिरावट आई है, कई दलहन के दाम समर्थन मूल्य के नीचे लुढ़क गए हैं। प्रदीप के मुताबिक कम दाम की वजह से इस साल दलहन खपत में बढ़ोतरी हो सकती है सामान्य खपत के मुकाबले अतीरिक्त 10 लाख टन दलहन की खपत होने का अनुमान है। सामान्य तौर पर सालभर में देश की दलहन खपत 235-240 लाख टन के बीच रहती है।

देश में दलहन की रिकॉर्ड पैदावार के बावजूद घरेलू जरूरत को पूरा करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है, देश में आयात होने वाले दलहन को फ्युमिगेट करना जरूरी है ताकि दलहन किसी तरह का हानिकारक कीट न रहे। फिलहाल देश में आयात होने वाले दलहन को मिथाइल ब्रोमाइड से फ्युमिगेट किया जाता है और सरकार ने जून अंत तक मिथाइल ब्रोमाइड से फ्युमिगेशन की इजाजत दे रखी है लेकिन जून के बाद इंडस्ट्री को दूसरा विकल्प तलाशना होगा, इसपर प्रदीप का कहना है कि सरकार खुद फ्युमिगेशन के लिए एल्युमीनियम फोस्फाइड पर रिसर्च कर रही है।

दालों पर आयात शुल्क पर प्रदीप घोरपड़े का कहना है कि सरकार ने तुअर आयात पर जो शुल्क लगाया है फिलहाल उससे कीमतों पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है, ऐसे में जरूरी है कि सरकार दलहन पर लगी स्टॉक लिमिट को हटाए ताकि किसानों को अच्छा भाव मिल सके।

मानसून को लेकर प्रदीप घोरपड़े का कहना है कि इसके कमजोर रहने पर तुअरउड़द और मूंग जैसे खरीफ दलहन पर असर पड़ेगा और साथ में जमीन में नमी की मात्रा भी घटेगी जिससे आगे चलकर रबी दलहन की बुआई प्रभावित हो सकती है। 

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